varn ke kitne bhed hote hain परिभाषा और उदाहरण

इस आर्टिकल के जरिये समझेंगे की वर्ण किसे कहते है? तथा यह भी समझेंगे की varn ke kitne bhed hote hain?

ध्वनि का लिखित रूप ही वर्ण कहलाता है यह किसी भी भाषा की सबसे छोटी इकाई होती है

वर्ण के लिखित रूप को लिपि चिन्ह या अक्षर कहते है

varn ke kitne bhed hote hain

वर्ण वह मूल ध्वनि हैं, जिस ध्वनि के खंड या टुकड़े नहीं किये जा सकते। वर्ण के कितने भेद होते है यह समझने से पूर्ण हम यह समझेंगे की वर्ण क्या है और इसकी परिभाषा क्या होती है

वर्ण की परिभाषा –

यह वर्ण हिंदी भाषा की सबसे छोटी इकाई होती है अर्थात यह हिंदी भाषा की सबसे लघुत्तम इकाई हैं। Hindi में इन वर्णो को ‘अक्षर’ कहा जाता है। वर्ण के उच्चारण और प्रयोग के आधार पर हिन्दी वर्ण के दो भेद किए गए हैं,इन्हे स्वर वर्ण और व्यंजन वर्ण कहा जाता है

1. स्वर वर्ण

स्वर वर्ण किसी के अधीन न होकर ये पूर्ण रूप से स्वतंत्र होते है इन्हे पूर्ण करने के लिए किसी अन्य वर्ण की आवश्यकता नहीं होती है

बल्कि यह वर्ण अन्य व्यंजन के साथ मिलकर किसी भी व्यंजन को पूर्ण कर देते है

इन स्वर वर्णो की संख्या कुल 13 है। अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ अं, अः।

स्वर के भेद

उच्चारण के समय को ध्यान में रखकर स्वर के तीन भेद होते है

ह्रस्व स्वर (Hrasva Swar)

वे स्वर जिनके उच्चारण करने के लिए कम-से-कम का समय प्रयोग होता हैं वह ह्रस्व स्वर कहलाते हैं।

यह स्वर की संख्या हिंदी वर्णमाला में चार वर्ण है- अ, इ, उ, ऋ। इन्हें ही मूल स्वर कहते हैं।

दीर्घ स्वर (Deergh Swar)

वे स्वर जिनका उच्चारण करने के लिए ह्रस्व स्वरों से दुगुना समय का प्रयोग होता है तो उन्हें ही दीर्घ स्वर कहते हैं।

हिंदी वर्णमाला में दीर्घ स्वर के सात वर्ण है – आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ।

प्लुत स्वर (Plut Swar)

वे स्वर जिनको उच्चारण करने के लिए दीर्घ स्वरों से भी अधिक का समय लगता है तो वे प्लुत स्वर कहलाते हैं।

अक्सर इन स्वरों का प्रयोग दूर से बुलाने में किया जाता है। जैसे – आऽऽ, ओ३म्, राऽऽम आदि।

Note – दीर्घ स्वरों को ह्रस्व स्वरों का दीर्घ रूप नहीं समझना चाहिए। यहाँ दीर्घ शब्द का प्रयोग उच्चारण में लगने वाले समय को आधार मानकर किया गया है।

अनुनासिक

जिस स्‍वर के उच्‍चारण में मुख के साथ नासिका की भी सहायता ली जाती है, उसे अनुनासिक स्‍वर कहते हैं।

यथा— अँ, एँ इत्‍यादि समस्‍त स्‍वर वर्ण।

निरनुनासिक

जिन स्वरों को बोलने के लिए नाक की जरुरत नहीं होती है अर्थात जो स्वर केवल मुख से बोले जाते है ,

वे स्वर निरनुनासिक स्वर कहलाते है।

संवृत और विवृत स्वर

संवृत स्वर (Samvrit Swar) – वे स्वर जिनको उच्चारण करते समय मुख का द्वारा सकरा हो जाता है वे संवृत स्वर कहलाते है

इन स्वर वर्णो की संख्या हिंदी वर्णमाला में कुल चार होती है – इ , ई , उ , ऊ।

अर्द्ध संवृत स्वर (Ardhd Samvrat Swar) – मुख का द्वारा कम सकरा हो जाता है वे अर्द्ध संवृत स्वर कहलाते है

अर्द्ध संवृत स्वर की संख्या हिंदी वर्ण माला में कुल 2 होती है – ए , ओ ।

विवृत स्वर (Vivrat Swar) – वे स्वर जिनको उच्चारण करते समय मुख द्वार पूरा खुल जाता है। वे विवृत स्वर कहलाते है

विवृत स्वर की संख्या हिंदी वर्णमाला में 2 है – आ, आँ ।

अर्द्ध विवृत स्वर (Ardhd Vivrat Swar) – वे स्वर जिनको उच्चारण करते समय मुख द्वार आधा ही खुलता है। वे अर्द्ध विवृत स्वर कहलाते है

विवृत स्वर की संख्या हिंदी वर्णमाला में 4 होते है – अ , ऐ , औ , ऑ।

संध्य स्वर (Sandhy Swar) – संध्य स्वर संख्या में चार होते है। – ए , ऐ , ओ , औ ।

समान स्वर (Samaan Swar) – समान स्वर, संध्य स्वरों को छोड़कर सभी शेष स्वर समान स्वर होते है। समान स्वर संख्या में 9 हैं। – अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, अं, अः।

2. व्यंजन

जिन वर्णों का उच्‍चारण स्‍वर वर्णों की सहायता के बिना नहीं किया जा सकता, उन्‍हें व्‍यञ्जन कहते है

जिनका मतलब हुआ की व्यंजन बिना स्वरों की सहायता के बोले ही नहीं जा सकते।

व्यंजन की संख्या हिंदी वर्णमाला में कुल 39 बतलायी गयी हैं।

व्यंजनों का अपना मूल स्वरूप इस प्रकार हैं- क् च् छ् ज् झ् त् थ् ध् आदि। 

अ लगने पर व्यंजनों के नीचे का हल चिह्न हट जाता है। तब ये इस प्रकार लिखे जाते हैं- क च छ ज झ त थ ध आदि।

व्यंजन के तीन भेद होते है 1. स्पर्श व्यंजन, 2. अंतःस्थ व्यंजन, 3. ऊष्म व्यंजन

स्पर्श व्यंजन – स्पर्श व्यंजन को पाँच वर्गों में विभाजित किया गया है और प्रत्येक वर्ग में पाँच-पाँच व्यंजन हैं। हर वर्ग का नाम पहले वर्ग के अनुसार रखा गया है जैसे:

क वर्ग- क ख ग घ ड़
च वर्ग- च छ ज झ ञ
ट वर्ग- ट ठ ड ढ ण (ड़ ढ़)
त वर्ग- त थ द ध न
प वर्ग- प फ ब भ म

अंतःस्थ व्यंजन – अन्तस्थ निम्न चार हैं – य र ल व
ऊष्म व्यंजन – ऊष्म व्यंजन निम्न चार हैं – श ष स ह

सयुंक्त व्यंजन (Mixed Consonants)

वैसे तो जहाँ भी दो अथवा दो से अधिक व्यंजन मिल जाते हैं वे संयुक्त व्यंजन कहलाते हैं,

किन्तु देवनागरी लिपि में संयोग के बाद रूप-परिवर्तन हो जाने के कारण इन तीन को गिनाया गया है।

ये दो-दो व्यंजनों से मिलकर बने हैं। जैसे-

क्ष = क्+ष – अक्षर,
ज्ञ = ज्+ञ – ज्ञान,
त्र = त्+र – नक्षत्र
श्र = श्+र – श्रवण

कुछ लोग क्ष, त्र, ज्ञ, श्र को भी हिन्दी वर्णमाला में गिनते हैं, पर ये संयुक्त व्यंजन हैं। अतः इन्हें वर्णमाला में गिनना उचित प्रतीत नहीं होता।

अनुस्वार

इस तरह के वर्णो का उच्चारण नाक से किया जाता है ऐसे वर्ण हमेश स्वर के बाद ही आते है

उदाहरण के लिए — अहम्- अहं | सामान्‍यतया ‘म’ व्यंजन वर्ण से पहले अनुस्वार ( ं) में बदल जाता है

  1. विसर्ग ;– विसर्ग का उच्चारण ”ह्” के रूप में किया जाता है

उदाहरण के लिए – रामः, गुरुः , देवः इत्यादि

2. संयुक्त व्यंजन – दो व्यंजनों के संयोग से बने वर्ण को संयुक्त व्यंजन कहते

उदाहरण—

i) क् + ष् = क्ष्
ii) त् + र् = त्र्
iii) ज् + ञ = ज्ञ

उच्चारण स्थान

मुख के जिस भाग से जिस वर्ण का उच्चारण होता है उसे उस वर्ण का उच्चारण स्थान कहते हैं। वर्णो का उच्चारण करते समय फेफड़ो से निकली वायु कंठ, तालू, दांत, होट इत्यादि स्थानों को स्पर्श करती है।

वर्णो के उच्चारण स्थान को हम दिए गए सारणी के जरिये बहुत ही आसानी से समझा सकेंगे

स्थानस्वरस्पर्श व्यंजनअंतःस्थ व्यंजनऊष्म व्यंजनअयोगवाहसंज्ञा
कंठअ, आक्, ख, ग, घ् , ङ:कण
तालूइ, ईच, छ् ्, ज, झ् , ञर्तालव्‍य
मूर्धाऋ, ऋट, ्ठ्, ड्, ढ, ण् ्ष्मरून््ध‍
दन्तत, ्थ, द् , ्ध, नस्दन्‍त्
होटउ, ऊप, फ् ्, ब, भ् , म् ्प, फओष
नासिकाअननुासिक
स्‍वर
ङ्, ञ, ण् , न् , मउपध्‍मानीय
कंठतालूए, ऐकण्‍ठतालव
कंठोष्ठओ, औकण्‍ठोष
दन्तोष्ठदंतोष्य
जिहयामूलजिह्वामलीय
स्पृष्ट्य –

वर्णो के उच्चारण के दौरान जब जीभ के विभिन्न भागो के द्वारा मुख के विभिन्न्न भाग को स्पर्श किया जाता है तो इस प्रक्रिया को स्पृष्ट्य कहते है।

क से म तक के सभी वर्णो को उच्चरित करने के लिए स्पृष्ट्य प्रक्रिया पूरी होती है

बाह्य प्रयत्न –

वर्णो के उच्चारण यत्न जो फेफड़ो से कंठ तक होता है उसे बाह्य प्रयत्न कहते है इसके ग्यारह भेद होते है।
विवार, संवार, श्वास, नाद, घोष, अघोष, अल्पप्राण, महाप्राण, उदात्त, अनुदात्त, स्वरित।

संवृत –

वर्णो के उच्चारण के दौरान फेफड़ो से निकलने वाले निःश्वास का मार्ग जब बंद रहता है तब इस प्रक्रिया को संवृत कहते है इसका प्रयोग केवल हस्व के उच्चारण के दौरान ही किया जाता है ।

विवृत –

वर्ण विशेष के उच्चारण के काल में जब मुख विवर खुला रहता है। तो इस मुख के इस प्रयत्न को विवृत कहते है सभी स्वर विवृत प्रयत्न से उच्चारित होते है

Most Asked Q&A

वर्ण वह मूल ध्वनि हैं, जिस ध्वनि के खंड या टुकड़े नहीं किये जा सकते। वर्ण के कितने भेद होते है यह समझने से पूर्ण हम यह समझेंगे की वर्ण क्या है और इसकी परिभाषा क्या होती है

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